
जब तुम किसी के प्रेम में उतरते हो तभी जान पाते हो |
जब तुम किसी के प्रेम में
उतर जाते हो–वह कोई भी हो,
मित्र हो, मां हो, पति हो, पत्नी हो,
प्रेयसी हो, प्रेमी हो, बच्चा हो, बेटा हो,
तुम्हारी गाय हो, तुम्हारे बगीचे में खड़ा हुआ वृक्ष हो,
तुम्हारे द्वार के पास पड़ी एक चट्टान हो,
इससे कोई फर्क नहीं पड़ता,
कोई भी हो–जहां
भी प्रेम की रोशनी पड़ती है,
उस प्रेम की रोशनी में दूसरी
तरफ से प्रत्युत्तर आने शुरू हो जाते हैं।
प्रेम की घड़ी में तुम अकेले नहीं रह जाते;
कोई संगी है, कोई साथी है।
और कोई तुम्हें इतना मूल्यवान समझता है
कि तुम्हें अपना जीवन दे दे;
तुम किसी को
इतना मूल्यवान समझते हो
कि अपना जीवन दे दो।
जरूर तुमने कुछ पा लिया जो जीवन से बड़ा है,
जिसके सामने जीवन गंवाने योग्य हो जाता है।
प्रेम का स्वर तुम्हारे जीवन में उतर आया।
ऐसा दूसरे की आंखों से घूम कर,
दूसरे के दर्पण से घूम कर ही तुम्हें
अपनी पहली खबर मिलती है कि मैं कौन हूं।
अन्यथा तुम राह के किनारे पड़े कंकड़-पत्थर हो।
प्रेम के माध्यम से गुजर कर ही पहली दफे तुम्हें
अपने हीरे होने का पता चलता है।
और जब ऐसी प्रतीति होने लगती है
कि तुम मूल्यवान हो,
तो यह बड़े राज की बात है कि जितना
तुम्हें एहसास होता है तुम मूल्यवान हो,
उतने ही मूल्यवान तुम होने भी लगते हो।
क्योंकि अंततः तो तुम परमात्मा हो; अंततः
तो तुम इस सारे जीवन का निचोड़ हो; अंततः
तो तुम्हारी चेतना नवनीत है
सारे अस्तित्व का।
लेकिन प्रेम से ही तुम्हें पहली
खबर मिलेगी कि तुम यहां
यूं ही नहीं फेंक दिए गए हो।
संयोगवशात तुम नहीं हो।
कोई नियति तुमसे पूरी हो रही है।
अस्तित्व की तुमसे कुछ मांग है।
अस्तित्व ने तुमसे कुछ चाहा है।
अस्तित्व ने तुम्हें कोई चुनौती दी है।
अस्तित्व ने तुम्हें यहां बनाया है
ताकि तुम कुछ पूरा कर सको।
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