
न तुम्हारे भीतर कुछ बुरा है न तुम्हारे भीतर कुछ भला है। तुम तो मात्र ऊर्जा हो – ओशो
न तुम्हारे भीतर कुछ बुरा है न तुम्हारे भीतर कुछ भला है। तुम तो मात्र ऊर्जा हो….
ऊर्जा अनेक रूपों में प्रकट हो सकती है। ऊर्जा एक सीढ़ी है। लेकिन सीढ़ी का जो नीचा से नीचा पायदान है, वह भी सीढ़ी के ऊंचे से ऊंचे पायदान से जुड़ा है। वे पृथक् नहीं हैं, विपरीत नहीं हैं। वे एक ही इंद्रधनुष के रंग हैं।
तुम्हारी कामवासना और तुम्हारी रामवासना अलग-अलग नहीं हैं, शत्रु नहीं हैं–एक ही ऊर्जा की तरंगें हैं। तुम्हारी कामवासना ही एक दिन रामवासना में रूपांतरित होती है। तुम्हारी संभोग की क्षमता ही एक दिन समाधि बनती है।
अगर दो नहीं हैं जगत् में तो फिर मनुष्य को भी दो में बांटने की कोई जरूरत नहीं।
और जैसे ही मनुष्य को न बांटा जाए, चिंता विसर्जित होती है।
जैसे ही मनुष्य को न बांटा जाए, तनाव शून्य हो जाता है।
जैसे ही मनुष्य को न बांटा जाए वैसे ही उत्सव है, वैसे ही नृत्य का आविर्भाव होता है।
जैसे ही मनुष्य को न बांटा जाए वैसे ही समाधि उतरनी शुरू हो जाती है।
मनुष्य है अखंड– जैसा है वैसा पूरा का पूरा!
जिन्होंने उसमें खंड किए, उन्हें जीवन की पूरी कला का ज्ञान न था; उन्हें पता न था कि सारी ऊर्जा को एक साथ, समवेत, एक संगीत में कैसे गूंथा जाए। उन्हें जीवन का आरकेस्ट्रा बनाने की सूझ-बूझ नहीं थी।
स्वभावतः जीवन को आरकेस्ट्रा बनाना हो, बहुत-से वाद्यों को एक ही संगीत में समाविष्ट करना हो तो बड़ी सूझ चाहिए, बड़ी अंतर्दृष्टि चाहिए–कि तुम्हारी देह तुम्हारे मन के साथ नाचे, तुम्हारा मन तुम्हारे आत्म के साथ नाचे, कि तुम्हारी पूरी त्रिवेणी इस पूरे अस्तित्व के साथ नाचे।
जिसने अपने शरीर को भी प्रेम नहीं किया, वह अपनी आत्मा को कैसे प्रेम कर सकेगा? जो दृश्य से भी प्रेम कर न सका, उसके अदृश्य से कोई संबंध जुडेंगे ?
अपने शरीर को भी प्रेम करो। उसी प्रेम की गहराई में तुम्हें मन की तरंगें मिलेंगी। अपने मन को भी प्रेम करो। उसी गहराई में तुम्हें आत्मा का शाश्वत आनंद भी छलकेगा। अपनी आत्मा को प्रेम करो और उसी में उतरते-उतरते तुम्हें परमात्मा के दर्शन होंगे।
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